॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥
॥ चौपाई ॥
जयति जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥१॥
चारि भुजा तनु श्याम विराजे।
माथे रतन मुकुट छबि छाजे॥२॥
परम विशाल मनोहर भाला।
नील वसन नयनन विकराला॥३॥
हाथ गदा त्रिशूल कुठारा।
सब सामर्थ्य समेत तुम्हारा॥४॥
पंवार सदन इंद्रासन दाता।
सूर्य पुत्र प्रभु दशरथ भ्राता॥५॥
छाया माता गर्भ तुम जाए।
त्रिविध ताप सदा मन भाए॥६॥
कर्म प्रधान सकल जग माहीं।
देह दंड प्रभु बिना तुम नाहीं॥७॥
शूभ अशूभ फल जग में धारी।
हाट बजार सभा बिचकारी॥८॥
उत्तम मध्यम अधम सतायो।
आप आप सब कर्मन पायो॥९॥
जगत चराचर जीव जहाना।