स्तोत्र संग्रह
हनुमान

सुंदरकांड

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॥ श्री सुंदरकाण्ड ॥ (श्रीरामचरितमानस — तुलसीदासकृत) ॥ श्लोक ॥ शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्। रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥ नान्यं दैवतं नान्यं दैवतं नान्यं दैवतं राम। कर्माणि मोचकं कर्माणि मोचकं कर्माणि मोचकं राम॥ प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः। मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा॥ ॥ दोहा ॥ जामवंत के बचन सुनि, सिला चरन चित लाइ। जय रघुपति जय रामजी, कह हनुमत उठि धाइ॥ ॥ चौपाई ॥ जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखहु तात। सहि दुख कंद मूल फल खात॥ जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि मन बिस्वासा। कहि कपि कीन्ह सिंधु महँ पाना। सकल चरन पुनि नावा माथा॥ सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥ बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥ जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥ ॥ दोहा ॥ हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥ ॥ चौपाई ॥ जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहूँ बल बुद्धि बिसेषा॥ सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्ह आइ कही तेहिं बाता॥ आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥ राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥ तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥ कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रसनि मोहि कहेउ हनुमाना॥ जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥ सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥ जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥ ॥ दोहा ॥ राम काजु सबु करिहि तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ ॥ चौपाई ॥ निसिचरि एक सिंधु महँ रहई। करि माया नभ के खग गहई॥ जेहिं जल चराचर जंतु समाना। जल बिलोकि नहिं परइ उराना॥ सोइ छल हनुमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरत चीन्हा॥ ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥ तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥ चहूँ दिसि फिरि कपि रूप सँवारा। लंका कहँ चला कीस बिचारा॥ ॥ दोहा ॥ कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चहुँ पुर कनक अटारि पर बैठी नारि मनि गना॥ ॥ चौपाई ॥ कपि कहँ बिलोकि लंकिनी लटकी। रे को तूँ कह अति हठ हटकी॥ जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥ मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥ जब रावनहिं ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ बिकल होसि तबहिं तोहि मिलिही। जब तोहि कपि मारिहि बजरी कपिही॥ तात मोर अति पुण्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥ ॥ दोहा ॥ प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ ॥ चौपाई ॥ मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥ नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सबहीं कर आसा॥ सुना कपि तेहि कीन्ह प्रहारा। परी भूमि करत पुकारा॥ [लंका प्रवेश — सीता शोधन] मंदिर मंदिर प्रति मुनि देखा। जातुधान अतिसय सुख रेखा॥ पुनि प्रभु मंदिर देखन गयऊ। रबिनंदन तहँ देखा भयऊ॥ राम काजु करिबे को आतुर। ह्रदय बिचारत बारहिं बार॥ कनक बिमान रतन जगमगाहीं। रावन मंदिर सोभा पाहीं॥ पुनि कपि देखा जुग अत दीपा। श्यामावयव सकल भुज भीपा॥ [अशोक वाटिका — सीता दर्शन] ॥ दोहा ॥ हरि कोटि कंचन मंदिर सुंदर, अशोक वन ताहि बिच सुंदर॥ ॥ चौपाई ॥ तहँ पुनि कपि देखा एक बागा। ता मँह एक अशोक अनुरागा॥ सीतहि मन में मनहि बिचारी। देखी मनहुँ महाभट भारी॥ सीता बैठी तरु तर देखी। कृश तनु सीस जटा एक भेखी॥ निसिचरिन्ह मध्य बैठि बिहाल। जनु गज घेरि कुरंगी बाल॥ गीध के जूथ मध्य कपोता। जनु धरमहि धरमति दुख पोता॥ क्षीन बसन मलीन अति देही। देखि न सकहिं परम संदेही॥ मन महुँ रामहिं सुमिरत जानकी। बीती तिहि बिधि रैनि दुखानकी॥ [त्रिजटा स्वप्न] ॥ चौपाई ॥ त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥ सबन्हि बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥ खर अरू आखर बिकट बिकराला। सपनें बूड़त लंक भुजाला॥ [हनुमान-सीता संवाद] ॥ दोहा ॥ सीता मन बिचार कर रुख देखि बड़ धीर। चला बिकल भइ बहु बिधि जगदम्बा रघुबीर॥ ॥ चौपाई ॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठि मन बिचार करयऊ॥ सुनि कपि गिरा सीता अति भीती। कहु रे कोन भूत पुनि प्रीती॥ हनुमंत निज नाम सुनाई। जानकी प्रति अस्तुति गाई॥ सुनहु माता मोहि जन जानी। कपि नहिं होइ निकट रजधानी॥ कपि प्रनाम कीन्ह सिर नाई। सीतहि बिलोकि बचन तब गाई॥ राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥ मातु कुशल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥ जनि जननी मन करसि अंदेसा। तुम्ह लागि धरिहैं कपि बेसा॥ कपि के बचन सुप्रेम सुनाये। सीता कर मन बिस्वास बढ़ाये॥ कहु कपि केहि बिधि राम मोहि पहचाना। कह कपि सुनहु देवी कल्याना॥ ॥ दोहा ॥ राम तुम्हार चरित रघुबीर। करत कृपानिधान रघुबीर॥ अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्। दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्॥ सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्। रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ॥ चौपाई ॥ नाथ मुद्रिका मेलि मुख माहीं। श्री रघुनाथ दई मोहि हाथी॥ सीतहि दीन्हि मुद्रिका तब ही। राम नाम अंकित अरू सब ही॥ जानी सीय हरष उर भारी। तबहिं रघुपति नामु उचारी॥ तव प्रताप उर रखि प्रभु मोरा। एहि सँदेश सुनत मम तोरा॥ [सीता चूड़ामणि देती हैं] ॥ दोहा ॥ कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राण। तुम्हहू तात कहत रघुराना॥ मम हित लागि तात करू ऐसा। तजूं देह पुनि करिहैं कैसा॥ ॥ चौपाई ॥ एहि बिधि सीता कहि बहु बाता। सुनि कपि उर भरि पुनि पुनि प्राता॥ कपि कहँ मातु ममता अति छोटी। एक एक दिन देइ बड़ मोटी॥ मातु सोच त्यागहु बड़ चिंता। सुमिरहु कृपाल रघुपति मन दीन्हा॥ मम बल सुनहु सीय सब गाथा। सकहि मोहि मारि सकल जातुधानी नाथा॥ [अशोक वाटिका उध्वंस] ॥ दोहा ॥ सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ ॥ चौपाई ॥ कपि भुख बढ़ सो बागहिं गयऊ। फल खात बन उजारत भयऊ॥ रखवारे मारत कपि जूथा। लागत नहिं ताके कछु हूथा॥ महा बीर मारि सब खाई। प्रभु कार्य बिन मोहि न कुछ खाई॥ [मेघनाद से युद्ध — ब्रह्मास्त्र बंधन] ॥ चौपाई ॥ पुनि कपि कीन्ह बहुत कपि लीला। मेघनाद तब आयऊ सीला॥ ब्रह्मांड अस्त्र कपि कहँ मारा। परिगत भयऊ नहिं संशय जारा॥ ब्रह्म बान कपि मूर्छा खाई। जागि उठि कर जोरि मनाई॥ बंधे कपि बिकराल बिचारा। मोर बिलोकि सकल दरबारा॥ [रावण दरबार — लंकादहन] ॥ दोहा ॥ जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ विलंब न लावो॥ ॥ चौपाई ॥ सभा मध्य कपि सोहइ कैसा। मनहुँ बीर रस धरें सरीसा॥ कपि बंधन सुनि रावन क्रोधा। मन महँ प्रबल बिचार बिरोधा॥ कपि कहँ तब बहु मारन लागे। कपि बिहँसि बोला सब त्यागे॥ कपि कहँ बहु त्रासे रावना। सुनि कपि बचन मुदित मन जाना॥ मोर पूँछ बर आगि लगाई। जारि जारि लंका सब जाई॥ पावक जरत शेष अस जाना। जारि सकल लंका हनुमाना॥ कूदि पर्यो समुद्र महँ धीरा। बुझी पूँछ करि मन गम्भीरा॥ [सीता के पास वापसी — चूड़ामणि लेकर] ॥ दोहा ॥ सीतहि कहि पुनि बचन सुहाई। कर जोरी कपि चरन सिरु नाई॥ चूड़ामणि उतारी तब दीन्हि। हरषि राम कहँ कपि लईं लीन्हि॥ ॥ चौपाई ॥ कपि सो मणि रघुबीर कहँ दई। नाइ सीस पद अस्तुति कई॥ राम पादुकन्हि नाइ सीसा। कपि चलेउ हरषित बल कीसा॥ [समुद्र पार — वानर सेना को समाचार] ॥ दोहा ॥ हरषि कपि सब मिलि तब गए। जामवंत कहँ बचन सुनाए॥ सब कपि मिले परम सुख पाई। पुनि राम कहँ भेंट कराई॥ ॥ चौपाई ॥ राम कपिन्ह महँ कहा सुनाई। सीता देखि हनुमंत आई॥ बचन सीता के कहि सुनाए। सुनि रघुपति अश्रु भर आए॥ चूड़ामणि मणि जो देखी। राम अत्री सीता सुख रेखी॥ हनुमान करि जोरि बिनय बहु कीन्हा। प्रभु नहिं कछु मोहि दीन्हा॥ सुनि कपि मन बिचार कर ठाना। प्रभु करुनानिधान मुस्काना॥ सुनहु कपि जो बिचार तुम्हारा। मम हित लागि तुम्ह सम कोउ न प्यारा॥ ॥ दोहा ॥ सुनि सीस धरि राम पद कपि चलेउ हरषात। तब प्रभु शिवहिं समरपि सकल सेवक सुख दात॥ [सुंदरकाण्ड समाप्ति] ॥ दोहा ॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम पाहीं॥ राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा॥ ॥ इति श्रीरामचरितमानसे सुंदरकाण्डः समाप्तः ॥

लाभ

सुंदरकांड पठणाचे फायदे: • सर्व संकटांचे निवारण — अत्यंत कठीण समस्यांमध्ये मार्ग सापडतो • मंगळवारी आणि शनिवारी पठण विशेष फलदायी • विवाह अडचण, नोकरी, आरोग्य समस्यांवर उपाय • भय, चिंता, उदासीनता दूर होते • घरात शांती आणि सौख्य येते • रामभक्ती आणि हनुमानभक्ती वाढते • नवरात्री, रामनवमी, हनुमान जयंती यावेळी विशेष पठण
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